शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे परियोजना: संक्षिप्त पृष्ठभूमि


🔷 परिचय

महाराष्ट्र की विकास योजनाओं में 'शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे' (Nagpur-Goa Shaktipeeth Expressway) को एक महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है, जो नागपुर से गोवा तक एक आधुनिक राजमार्ग के रूप में निर्माणाधीन है। इस परियोजना का उद्देश्य क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाना, पर्यटन और औद्योगिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना तथा समय की बचत करना है।

हालांकि, इस परियोजना ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक नए संघर्ष को जन्म दिया है। लगभग 12 जिलों के हजारों किसानों और ग्रामीणों ने 1 जुलाई 2025 को एकसाथ चक्का जाम कर अपना विरोध दर्ज कराया। उनके अनुसार, सरकार ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती और ग्रामीणों के अधिकारों की अनदेखी की गई।


🔷 शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे परियोजना: संक्षिप्त पृष्ठभूमि

‘शक्तिपीठ’ नामक यह एक्सप्रेसवे नागपुर से शुरू होकर मराठवाड़ा, पश्चिम महाराष्ट्र होते हुए गोवा तक जाएगा। इस एक्सप्रेसवे के अंतर्गत कुल 12 ज़िलों की भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है, जिससे लगभग 2000 से अधिक गाँव प्रभावित होंगे। सरकार का दावा है कि यह राजमार्ग धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा और क्षेत्रीय विकास को गति देगा।

लेकिन स्थानीय निवासियों और किसान संगठनों का आरोप है कि—

  • परियोजना के नक्शे गाँववालों से छिपाए गए हैं,

  • किसानों को उचित मुआवजा नहीं दिया जा रहा है,

  • पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना भूमि अधिग्रहण हो रहा है।


🔶 चक्का जाम आंदोलन: 1 जुलाई 2025 की मुख्य घटनाएँ

1 जुलाई को सुबह से ही महाराष्ट्र के 12 जिलों में हजारों किसानों ने अपने-अपने क्षेत्रों में सड़कों पर उतरकर चक्का जाम कर दिया।
प्रमुख ज़िलों में शामिल थे:

  • कोल्हापुर

  • सातारा

  • सांगली

  • बीड

  • लातूर

  • सोलापुर

  • परभणी

  • हिंगोली

  • उस्मानाबाद

  • औरंगाबाद

🔹 आंदोलन के मुख्य नारे:

  • "ज़मीन हमारी, अधिकार हमारा"

  • "शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे रद्द करो!"

  • "हम विकास विरोधी नहीं, अन्याय के विरोधी हैं"

🔹 आंदोलन का नेतृत्व:

इस आंदोलन का नेतृत्व किया स्वाभिमानी किसान संगठन के अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद राजू शेट्टी ने। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि यह परियोजना किसानों को बर्बाद करने की साजिश है।


🔷 किसानों की माँगें क्या हैं?

  1. भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता:

    • सभी गाँवों के नक्शे सार्वजनिक किए जाएं

    • किसानों से बिना सहमति के भूमि अधिग्रहण न हो

  2. पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) की माँग:

    • यह राजमार्ग जंगलों और जलस्रोतों से होकर गुजरता है

    • बिना EIA के परियोजना आगे नहीं बढ़नी चाहिए

  3. उचित मुआवजा और पुनर्वास नीति:

    • जमीन के बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजा

    • विस्थापित परिवारों के लिए पुनर्वास योजना

  4. वैकल्पिक मार्ग का प्रस्ताव:

    • ग्राम्य इलाकों की बजाय राजमार्ग को पहले से विकसित क्षेत्रों से जोड़ा जाए

    • इससे खेतों और जलस्त्रोतों की रक्षा हो सकेगी


🔷 सरकार की प्रतिक्रिया

राज्य सरकार ने दावा किया कि यह परियोजना किसानों की सहमति से चल रही है और केवल 30% भूमि अधिग्रहण ही विवादित है।
सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा:

“शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे महाराष्ट्र के लिए जीवन रेखा साबित होगा। हम किसी किसान की ज़मीन जबरन नहीं ले रहे हैं।”

हालांकि, आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने बातचीत के लिए कमेटी बनाने की घोषणा की और विवादास्पद ज़िलों में सर्वेक्षण फिलहाल स्थगित कर दिया गया।


🔷 राजनीतिक प्रतिक्रिया

  • विपक्षी दलों ने आंदोलन का समर्थन किया।

  • शिवसेना (उद्धव गुट)एनसीपी (शरद पवार), और कांग्रेस नेताओं ने कहा कि किसानों की बिना सहमति से विकास नहीं हो सकता।

  • राजू शेट्टी ने कहा कि वे संसद तक यह आवाज़ ले जाएंगे अगर सरकार ने जल्द समाधान नहीं निकाला।


🔷 ग्रामीणों का दर्द: ज़मीनी हकीकत

कोल्हापुर ज़िले के किसान शिवाजी पाटिल कहते हैं:

“हमने वर्षों तक मेहनत से यह ज़मीन बनाई है, और अब एक झटके में कोई इसे सड़क के लिए लेना चाहता है... बिना हमसे पूछे।”

लातूर के एक महिला किसान ने कहा:

“सड़क बनती है तो मंदिर जाएँगे, लेकिन हमारे खेत उजड़ गए तो हम पूजा क्या देंगे?”


🔷 मीडिया और सोशल मीडिया में आंदोलन की गूंज

  • प्रमुख अखबारों और न्यूज चैनलों ने आंदोलन को व्यापक कवरेज दी।

  • ट्विटर पर #ShaktipeethExpressway और #SaveOurFarms ट्रेंड कर रहे थे।

  • कई पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया।


🔷 आंदोलन का प्रभाव

  • कई जगहों पर ट्रैफिक बाधित हुआ, लेकिन आंदोलन शांतिपूर्ण रहा।

  • सरकार पर दबाव बढ़ा, जिससे वह संवाद के लिए बाध्य हुई।

  • जनता में किसानों के प्रति सहानुभूति बढ़ी।


🔷 निष्कर्ष: विकास बनाम जनसहमति

शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे परियोजना एक तरफ जहां विकास का मार्ग है, वहीं दूसरी तरफ यह ग्रामीणों की आजीविका और भूमि अधिकारों का भी प्रश्न है।
वास्तविक विकास वही होता है जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारीसहमति, और हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

चक्का जाम के माध्यम से किसानों ने यह संदेश साफ दिया है — “विकास हमारी सहमति से हो, हमारी कीमत पर  नहीं!

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