शाक्तिपीठ हाईवे परियोजना के विरोध में किसान आंदोलन: 1 जुलाई को चक्का जाम की चेतावनी


🚜 शाक्तिपीठ हाईवे परियोजना के विरोध में किसान आंदोलन: 1 जुलाई को चक्का जाम की चेतावनी


🔷 भूमिका: विकास बनाम अधिकार की टकराहट

महाराष्ट्र के पश्चिमी क्षेत्र में प्रस्तावित शाक्तिपीठ हाईवे परियोजना को लेकर एक बार फिर किसानों और सरकार के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। 1 जुलाई 2025 को कई जिलों के किसान संगठनों ने सड़क जाम (चक्का जाम) आंदोलन की घोषणा की है।
इस विरोध की मुख्य वजह है कि सरकार द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना या सहमति के खेतों और ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सर्वेक्षण कार्य शुरू कर दिया गया, जिससे किसानों में रोष व्याप्त है।

यह मामला केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भूमि अधिकार, आजीविका की सुरक्षा, पारदर्शिता, और पर्यावरणीय चिंताओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।


🛣️ परियोजना का अवलोकन: शाक्तिपीठ हाईवे क्या है?

  • शाक्तिपीठ हाईवे एक बहुजिला-प्रशासनिक गलियारा है, जो महाराष्ट्र के पश्चिमी भागों में प्रमुख धार्मिक स्थलों (जैसे अंबाबाई मंदिर, महालक्ष्मी शक्तिपीठ, तुळजापुर आदि) को जोड़ने के उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है।

  • इसका उद्देश्य धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहन देना, स्थानीय व्यापार को गति देना और यातायात में सहजता लाना है।

  • यह प्रोजेक्ट राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) तथा महाराष्ट्र सरकार की संयुक्त परियोजना के रूप में प्रस्तावित है।

  • कुल लंबाई लगभग 315 किलोमीटर बताई जा रही है, जिसमें ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया 60% से अधिक हिस्सों में बाकी है।


⚠️ विवाद का मूल कारण: बिना अनुमति सर्वे

किसानों का मुख्य आरोप है कि:

  • सरकार ने न तो अधिसूचना जारी की, न ग्रामसभाओं से मंज़ूरी ली, और सीधे भूमि चिन्हांकन और मापन का काम शुरू करवा दिया।

  • ज़मीन पर सर्वे नंबर अंकित कर दिए गए, जिनका ग्रामीणों को कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

  • अनेक स्थानों पर प्राइवेट सर्वे एजेंसियों ने खेतों में घुसकर काम किया, जिससे भूमि स्वामियों में असुरक्षा की भावना पैदा हुई।

किसानों का सवाल है:

“जब सरकार हमारी ज़मीन लेना चाहती है, तो क्या हमारी सहमति जरूरी नहीं है?”


🧓🏼 प्रभावित किसान परिवारों की स्थिति

  • बड़ी संख्या में प्रभावित परिवार छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनकी आय का एकमात्र स्रोत खेती और पशुपालन है।

  • जिन ज़मीनों पर सर्वे किया जा रहा है, उनमें कई "गोताई जमीन" (परंपरागत स्वामित्व) की श्रेणी में आती हैं, जिनका रिकॉर्ड सरकारी कागज़ों में अद्यतित नहीं है।

  • ऐसे परिवारों को मुआवज़ा मिलना भी अनिश्चित होता है।

  • ग्रामीणों का यह भी कहना है कि किसी भी स्तर पर सार्वजनिक जनसुनवाई नहीं करवाई गई, न ही पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) को सार्वजनिक किया गया।


🔥 किसानों का आंदोलन: चक्का जाम और विरोध रणनीति

📢 1 जुलाई को प्रस्तावित आंदोलन के मुख्य बिंदु:

  • कोल्हापुर, सांगली, सतारा, और सोलापुर जिलों में मुख्य राजमार्गों और तहसील कार्यालयों का घेराव किया जाएगा।

  • किसानों ने स्थानीय प्रशासन को पहले ही ज्ञापन सौंपकर चेतावनी दी है कि अगर सर्वे कार्य नहीं रोका गया, तो आंदोलन उग्र रूप ले सकता है।

  • महिला किसानों, ग्रामीण युवाओं और मजदूर संगठनों ने भी इस आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की है।

🔊 प्रमुख नेतृत्वकर्ता संगठनों में शामिल हैं:

  • शेतकरी संघटना

  • भूमीहक्क आंदोलन परिषद

  • किसान संघर्ष मोर्चा

  • लोकशक्ति मंच

इन संगठनों का कहना है कि वे शांतिपूर्वक विरोध करेंगे, लेकिन यदि सरकार ने बल प्रयोग किया तो पूरे क्षेत्र में असहयोग आंदोलन शुरू किया जाएगा।


👩‍⚖️ प्रशासन की प्रतिक्रिया और तर्क

  • राज्य सरकार का कहना है कि परियोजना अभी पूर्व-योजना स्तर पर है और ज़मीन अधिग्रहण की कोई अंतिम कार्रवाई नहीं हुई है।

  • सर्वे का उद्देश्य केवल “फिजिबिलिटी स्टडी” (व्यवहार्यता परीक्षण) है।

  • प्रशासनिक अधिकारियों ने दावा किया कि वे ग्राम पंचायतों से परामर्श कर रहे हैं, और किसानों की राय ली जाएगी।

हालांकि, यह स्पष्टीकरण स्थानीय स्तर पर न तो सार्वजनिक रूप से घोषित हुआ है, न ही उसका कोई लिखित प्रमाण सामने आया है। इससे असंतोष और अविश्वास की स्थिति बनी हुई है।


🌿 पर्यावरणीय चिंताएं

  • जिस रूट से हाईवे गुजरेगा, वहां कई वन क्षेत्र, जलस्रोत और कृषि आर्द्रभूमियाँ (wetlands) हैं।

  • पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह परियोजना इन संवेदनशील इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती है।

  • विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि सरकार को पहले EIA (Environmental Impact Assessment) रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए थी, जो अब तक जारी नहीं की गई।


💰 मुआवज़ा, पुनर्वास और आर्थिक चिंता

  • किसानों की बड़ी चिंता यह भी है कि मुआवज़ा दरें अस्पष्ट हैं

  • जिन किसानों की ज़मीन जाएगी, उनके लिए वैकल्पिक खेती की व्यवस्था या स्थायी पुनर्वास योजना का कोई खाका नहीं दिया गया है।

  • पहले की कई परियोजनाओं में मुआवज़ा मिलने में वर्षों लगे हैं; उदाहरणस्वरूप, समृद्धि महामार्ग परियोजना में भी कई किसान अब तक भुगतान की प्रतीक्षा में हैं।


📉 आंदोलन का संभावित असर

  • यातायात बाधित होने की आशंका

  • प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव

  • सरकार की छवि पर असर

  • सामाजिक तनाव का उभार, विशेषकर ग्रामीण और शहरी विकास के बीच टकराव

  • निवेशकों की निगाहों में परियोजना की अस्थिरता


🧭 समाधान के संभावित विकल्प

किसान संगठनों और विशेषज्ञों ने मिलकर कुछ समाधान सुझाए हैं:

  1. तत्काल सर्वेक्षण पर रोक और ग्रामसभाओं से पुनः परामर्श

  2. विस्तृत EIA रिपोर्ट का सार्वजनिक प्रकटीकरण

  3. मुआवज़े की न्यूनतम गारंटी और समयसीमा तय करना

  4. भूमिहीन किसानों और मजदूरों को भी पुनर्वास योजना में शामिल करना

  5. स्थानीय पर्यावरण समूहों की भागीदारी से वैकल्पिक रूट की खोज

  6. तीसरे पक्ष की निगरानी समिति की नियुक्ति


निष्कर्ष: ज़मीन सिर्फ विकास की नहीं, जीवन की बुनियाद है

यह साफ है कि बुनियादी ढाँचे का विकास आवश्यक है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक परामर्श, पारदर्शिता और सामाजिक न्याय को दरकिनार करके किया जाए, तो वह विकास नहीं, बल्कि विखंडन का कारण बन सकता है।

शाक्तिपीठ हाईवे परियोजना पर चल रहा किसान आंदोलन यह याद दिलाता है कि भारत का ग्रामीण समाज सिर्फ जमीन का मालिक नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है। यदि सरकार विकास को सफल और स्थायी बनाना चाहती है, तो उसे भूमि और लोगों के बीच का रिश्ता समझना होगा, और "विकास संवाद" को प्राथमिकता देनी होगी।


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