ईरान–इज़राइल संघर्षविराम: सीमित प्रभाव और भविष्य की चुनौतियाँ
25 जून 2025 को ईरान और इज़राइल के बीच संघर्षविराम लागू हुए 24 घंटे से अधिक समय हो चुके हैं। अमेरिकी मध्यस्थता और वैश्विक दबाव के चलते दोनों देशों ने अपने सैन्य अभियानों को रोक दिया है। हालांकि, परमाणु ठिकानों पर हुए हमलों का प्रभाव अभी भी सीमित रूप में सामने आ रहा है, और क्षेत्र में पूरी तरह स्थिरता अभी दूर की बात लग रही है। आइए, इस संघर्षविराम की स्थिति और उसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करें।
संघर्षविराम की पृष्ठभूमि
बीते दो सप्ताहों में ईरान और इज़राइल के बीच हुए सैन्य संघर्ष ने पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र को दहला दिया। इज़राइल द्वारा ईरान के तीन परमाणु ठिकानों — फ़ोर्डो, नतांज़ और इस्फहान — पर किए गए हमलों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अस्थायी रूप से बाधित किया। वहीं, ईरान ने भी जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमलों से इज़राइल के तेल अवीव, हाइफ़ा और यरुशलम जैसे शहरों को निशाना बनाया।
परमाणु ठिकानों पर हमलों का प्रभाव
1. सीमित संरचनात्मक नुकसान:
हालांकि बी-2 बमवर्षकों द्वारा की गई बमबारी ने स्थलों को प्रभावित किया, लेकिन ईरान की गहरी भूमिगत संरचनाओं ने अधिकांश परमाणु सामग्री और उपकरणों को सुरक्षित रखा।
2. IAEA की प्राथमिक रिपोर्ट:
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, इन हमलों से ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर तात्कालिक असर पड़ा है, लेकिन दीर्घकालिक क्षति का निर्धारण अभी किया जा रहा है।
3. परमाणु प्रसार का खतरा:
इस हमले ने वैश्विक समुदाय को चिंतित किया है कि परमाणु ठिकानों पर हमले से रेडियोधर्मी सामग्री लीक हो सकती थी, जिससे पर्यावरणीय संकट उत्पन्न हो सकता था। सौभाग्यवश, ऐसी कोई बड़ी आपदा अब तक नहीं हुई है।
संघर्षविराम के बाद की स्थिति
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सैन्य गतिविधियाँ रुकीं लेकिन सतर्कता बरकरार: दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से संघर्षविराम की घोषणा की, परंतु सीमाओं पर सेना अभी भी पूरी सतर्कता में तैनात है।
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ड्रोन और साइबर हमले जारी: कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, सीमित संख्या में ड्रोन और साइबर हमले जारी हैं, लेकिन दोनों देश इसे 'प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया' कहकर टाल रहे हैं।
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राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़: संघर्षविराम के बाद दोनों देशों के नेताओं के बीच बयानबाज़ी जारी है। इज़राइल ने ईरान को 'स्थायी खतरा' बताया, वहीं ईरान ने इज़राइल को 'अवैध सैन्य आक्रामक' कहा।
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नागरिकों की स्थिति: युद्धग्रस्त क्षेत्रों में लोग अभी भी भय के साए में जी रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियां राहत पहुंचाने में जुटी हैं।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं
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अमेरिका: अमेरिका ने इस संघर्षविराम को अपनी कूटनीतिक सफलता बताया, लेकिन साथ ही क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की चुनौती को स्वीकारा।
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रूस और चीन: दोनों देशों ने अमेरिका पर पक्षपात का आरोप लगाया और संघर्षविराम की निष्पक्ष निगरानी की मांग की।
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संयुक्त राष्ट्र: UN ने संघर्षविराम का स्वागत किया और दोनों देशों से 'रचनात्मक संवाद' की अपील की।
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यूरोपीय संघ: EU ने क्षेत्र में मानवीय सहायता भेजने का निर्णय लिया और परमाणु स्थलों की सुरक्षा के लिए विशेषज्ञ दल नियुक्त किए।
भारत का दृष्टिकोण
भारत ने संघर्षविराम का स्वागत करते हुए क्षेत्र में स्थायी शांति और संयम की अपील की। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत सभी देशों के साथ संवाद और सहयोग का पक्षधर है।
भारतीय दूतावास ने ईरान और इज़राइल से लगभग 300 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया है। साथ ही, भारतीय सेना और वायुसेना को किसी भी आपात स्थिति के लिए अलर्ट पर रखा गया है।
भविष्य की चुनौतियाँ
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स्थायी शांति की तलाश: संघर्षविराम अस्थायी समाधान है, जब तक दोनों देश अपने बुनियादी मतभेदों को बातचीत के माध्यम से हल नहीं करते, तब तक संकट की संभावना बनी रहेगी।
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परमाणु हथियार नियंत्रण: इस संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि परमाणु हथियारों की उपस्थिति केवल शक्ति नहीं, बल्कि खतरा भी बन सकती है।
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मानवाधिकार और पुनर्वास: युद्ध में प्रभावित नागरिकों की सुरक्षा, पुनर्वास और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़े स्तर पर सहयोग की आवश्यकता है।
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आर्थिक प्रभाव: युद्ध ने तेल कीमतों को प्रभावित किया है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है।
निष्कर्ष
ईरान और इज़राइल के बीच चल रहे संघर्ष का संघर्षविराम एक स्वागतयोग्य कदम है, परंतु यह अंत नहीं, बल्कि शांति की दिशा में पहला कदम है। परमाणु स्थलों पर हमलों ने यह सिखाया कि शक्ति का संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है और कैसे कूटनीति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
जब तक दोनों देश आपसी संवाद, विश्वास और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को स्वीकार नहीं करते, तब तक संघर्षविराम केवल एक विराम है — समाधान नहीं।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह संघर्षविराम शांति में बदलेगा, या फिर यह एक और युद्ध की भूमिका बनेगा। विश्व की नजरें अब पश्चिम एशिया पर टिकी हैं।
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