"सिंधु जल संधि पर दरार: भारत का निलंबन फैसला, भारत-पाक संबंधों में नया जल संकट"


🔷 प्रस्तावना: सिंधु जल संधि का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित हुई थी। इसे विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने मंजूरी दी थी। यह संधि सिंधु नदी प्रणाली के जल संसाधनों के बंटवारे को लेकर दुनिया की सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय जल संधियों में से एक मानी जाती रही है।

इस संधि के तहत तीन पूर्वी नदियाँ — सतलुज, ब्यास और रावी भारत को दी गईं और तीन पश्चिमी नदियाँ — सिंधु, झेलम और चिनाब का नियंत्रण पाकिस्तान को सौंपा गया। हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों का सीमित उपयोग (जैसे सिंचाई, पनबिजली) की अनुमति दी गई थी।


🔷 हालिया घटनाक्रम: भारत का निर्णय

2025 में भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए इस संधि को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित करने की घोषणा की है। यह कदम भारत की सुरक्षा चिंताओं, जल संसाधनों के बदलते परिदृश्य और पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए उठाया गया है।

भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक वक्तव्य में कहा गया:

"भारत अब इस संधि का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान ने बार-बार जल विवादों को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया है और संधि की भावना के खिलाफ कार्य किया है।"


🔷 भारत का दृष्टिकोण और तर्क

भारत के इस निर्णय के पीछे कई ठोस तर्क सामने रखे गए हैं:

  1. राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद
    पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवादी संगठनों के कारण भारत में बार-बार हिंसक हमलों की घटनाएँ होती रही हैं। भारत का मानना है कि जल जैसे संवेदनशील संसाधन को साझा करना एकतरफा समझदारी नहीं है जब दूसरा पक्ष आतंक को बढ़ावा देता है।

  2. बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आपत्ति
    पाकिस्तान ने बार-बार भारत के जल परियोजनाओं — जैसे किशनगंगा और राटले हाइड्रो प्रोजेक्ट्स — को लेकर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का सहारा लिया। इससे संधि की मूल भावना को चोट पहुँची।

  3. जलवायु परिवर्तन और घरेलू आवश्यकताएँ
    भारत की बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संसाधनों पर भारी दबाव है। भारत का कहना है कि उसे अपनी ही नदियों पर अधिक नियंत्रण की आवश्यकता है।


🔷 पाकिस्तान की प्रतिक्रिया

भारत के निर्णय पर पाकिस्तान ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे "आक्रामक और संधि उल्लंघन" बताया।

पाकिस्तानी मीडिया और विश्लेषकों का मानना है कि:

  • यह निर्णय दक्षिण एशिया में जल संकट को और भड़का सकता है।

  • यह कश्मीर और पंजाब जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तनाव को बढ़ा सकता है।

  • पाकिस्तान को कृषि और पीने के पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है।


🔷 अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

विश्व बैंक, जो इस संधि में तीसरा पक्ष रहा है, ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है।
संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ने संयम बरतने और वार्ता के माध्यम से समाधान निकालने की सलाह दी है।

संभावित प्रतिक्रिया:

  • डिप्लोमैटिक दबाव: भारत पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक दबाव डाला जा सकता है।

  • मानवाधिकार मुद्दा: पाकिस्तान इसे “जल हथियार” के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।


🔷 पर्यावरण और मानवीय प्रभाव

यदि भारत सिंधु नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है या रोकता है, तो इसके पर्यावरणीय और मानवीय प्रभाव गहरे होंगे:

  • पाकिस्तान के पंजाब और सिंध क्षेत्र सिंचाई के लिए मुख्यतः सिंधु नदी पर निर्भर हैं।

  • पानी की आपूर्ति में भारी कटौती का खतरा है जिससे कृषि, पेयजल और ऊर्जा उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं।

  • दोनों देशों में सीमा क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों की आजीविका और स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा।


🔷 वैकल्पिक समाधान और वार्ता की संभावना

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि संधि को पूर्णतः तोड़ना अंतिम रास्ता नहीं होना चाहिए। भारत चाहें तो संधि की शर्तों में संशोधन या रिव्यू प्रोसेस शुरू कर सकता है।

भारत और पाकिस्तान के बीच तकनीकी, राजनयिक और नीति स्तर पर फिर से वार्ता शुरू कर —

  • विवादित परियोजनाओं पर पारदर्शिता

  • नये जल प्रबंधन मॉडल

  • द्विपक्षीय निगरानी समितियों
    जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं।


🔷 सामरिक दृष्टिकोण और रणनीतिक लाभ

भारत के इस कदम को रणनीतिक रूप से एक मजबूत संकेत माना जा रहा है कि वह केवल सैन्य या कूटनीतिक ही नहीं, बल्कि जल संसाधन को भी रणनीतिक साधन के रूप में उपयोग करने को तैयार है।

इसके प्रभाव:

  • पाकिस्तान पर मनोवैज्ञानिक दबाव

  • जल-सुरक्षा पर भारत का नियंत्रण बढ़ेगा

  • भविष्य की वार्ताओं में भारत की सौदेबाजी की शक्ति में वृद्धि


🔷 निष्कर्ष: भविष्य की राह

भारत द्वारा Indus Waters Treaty को निलंबित करना केवल एक पर्यावरणीय या कानूनी मुद्दा नहीं है, यह एक भू-राजनीतिक कदम है, जो भारत की बदलती विदेश नीति और सुरक्षा नीति को दर्शाता है।

यह निर्णय:

  • पाकिस्तान को अपने रवैये पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर सकता है

  • भारत के जल संसाधन प्रबंधन की दिशा तय करेगा

  • दक्षिण एशिया में जल कूटनीति के नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह निर्णय स्थायी टूट की ओर बढ़ेगा या पुनः संवाद और समझौते की ओर लौटेगा।



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