ईरान–इजराइल संघर्षविराम: मध्य पूर्व में शांति की नई उम्मीद


 

ईरान–इजराइल संघर्षविराम: मध्य पूर्व में शांति की नई उम्मीद

24 जून 2025 को एक ऐतिहासिक मोड़ पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि ईरान और इज़राइल के बीच एक पूर्ण और अंतिम सीजफायर (संघर्षविराम) पर सहमति हो चुकी है। यह घोषणा केवल दो देशों के बीच के युद्ध का अंत नहीं है, बल्कि यह पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र के लिए एक शांति की किरण और विश्व राजनीति के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है।


12 दिन की तबाही: युद्ध की पृष्ठभूमि

12 दिन पहले जब ईरान और इज़राइल के बीच सैन्य तनाव ने पूर्ण युद्ध का रूप ले लिया, तब किसी को यह अंदाजा नहीं था कि यह टकराव इस कदर विकराल रूप ले लेगा। दोनों देशों ने मिसाइल हमले, ड्रोन हमले और साइबर युद्ध के ज़रिए एक-दूसरे के अहम सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया।

इस दौरान दुनिया भर में आशंका बनी रही कि कहीं यह टकराव परमाणु युद्ध में न बदल जाए। अमेरिका, रूस, चीन, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र ने बार-बार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की, लेकिन स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती गई।


युद्ध की मुख्य घटनाएं

  1. ईरानी परमाणु स्थलों पर हमला: इज़राइल ने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों - फ़ोर्डो, नतांज़ और इस्फहान - पर बी-2 बमवर्षकों के ज़रिए हमले किए। इन हमलों में काफी नुकसान हुआ, जिससे ईरान का परमाणु कार्यक्रम महीनों पीछे चला गया।

  2. तेल अवीव और यरुशलम पर मिसाइलें: ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इज़राइल के प्रमुख शहरों पर मिसाइलें दागीं। सैकड़ों लोग हताहत हुए और बड़े पैमाने पर संरचनात्मक क्षति हुई।

  3. साइबर युद्ध: दोनों देशों ने एक-दूसरे के महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे पर साइबर अटैक किए। ईरान में बिजली संयंत्र ठप हो गए, जबकि इज़राइल की बैंकिंग प्रणाली कुछ समय के लिए जाम हो गई।

  4. मानवाधिकार संकट: इस युद्ध के चलते लाखों लोग बेघर हो गए। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 70,000 से अधिक लोग सीमा पार शरण लेने को मजबूर हुए।


अमेरिका की भूमिका: ट्रंप की रणनीति

पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप 2024 में दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से मध्य पूर्व नीति को नए रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। ईरान–इज़राइल युद्ध ने ट्रंप प्रशासन को कड़ी आलोचना के घेरे में ला खड़ा किया। लेकिन उन्होंने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण रणनीति अपनाई:

  • गोपनीय वार्ता: अमेरिका ने ओमान और कतर के माध्यम से बैक-चैनल डिप्लोमैसी शुरू की।

  • आर्थिक दबाव: दोनों देशों को आर्थिक प्रतिबंधों और व्यापारिक लाभों के साथ वार्ता के लिए मजबूर किया गया।

  • संयुक्त राष्ट्र और जी20 की मध्यस्थता: इन मंचों का उपयोग कर वैश्विक सहमति बनाई गई कि युद्ध से किसी का लाभ नहीं है।


सीजफ़ायर की शर्तें

  1. सीमित सैन्य उपस्थिति: दोनों देशों को सीमा क्षेत्रों में सैनिकों की तैनाती सीमित करने का आदेश।

  2. परमाणु निरीक्षण: ईरान को IAEA (अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) के निरीक्षण के लिए पूर्ण अनुमति देनी होगी।

  3. गाजा और लेबनान पर नियंत्रण: इज़राइल को हिजबुल्लाह और हमास से संबंधित मुद्दों पर संयम बरतने को कहा गया है।

  4. मानवीय सहायता: संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में दोनों देशों में पुनर्वास कार्यक्रम चलाए जाएंगे।


वैश्विक प्रतिक्रियाएं

  • संयुक्त राष्ट्र: महासचिव ने इस सीजफायर का स्वागत करते हुए कहा कि यह एक "नया अध्याय" है।

  • रूस और चीन: दोनों देशों ने अमेरिका की पहल की सराहना की लेकिन साथ ही स्वतंत्र निगरानी की मांग रखी।

  • यूरोपीय संघ: EU ने ईरान को आर्थिक राहत देने और इज़राइल को हथियार निर्यात में अस्थायी रोक लगाने की घोषणा की।


भारत का रुख

भारत ने इस सीजफायर का स्वागत करते हुए कहा कि शांति ही विकास का मार्ग है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में बताया कि यह निर्णय पूरे विश्व के लिए राहत है। भारत ने मध्य पूर्व में फंसे लगभग 300 भारतीयों को सुरक्षित बाहर निकालने का भी कार्य किया।


भविष्य की चुनौतियाँ

  1. विश्वास की बहाली: वर्षों से जारी आपसी अविश्वास को दूर करना आसान नहीं होगा।

  2. आंतरिक राजनीति: दोनों देशों के कट्टरपंथी गुट इस समझौते का विरोध कर सकते हैं।

  3. नियंत्रण और निगरानी: समझौते की निगरानी कैसे होगी, यह एक बड़ा प्रश्न है।

  4. आर्थिक पुनर्निर्माण: युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए अरबों डॉलर की आवश्यकता होगी।


निष्कर्ष: शांति की ओर एक मजबूत कदम

ईरान और इज़राइल के बीच यह संघर्षविराम केवल दो देशों की नहीं, बल्कि समूची मानवता की जीत है। इस युद्ध ने यह सिखाया कि संघर्ष और हथियारों से केवल विनाश होता है। शांति, संवाद और कूटनीति ही स्थायी समाधान हैं। अमेरिका की मध्यस्थता, संयुक्त राष्ट्र की पहल और वैश्विक दबाव ने इस युद्ध को रोका, लेकिन अब यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि यह शांति स्थायी हो।

विश्व समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह न केवल इस समझौते को बनाए रखे, बल्कि युद्ध से प्रभावित लाखों लोगों के जीवन को फिर से संवारने में सहायता करे। आने वाले वर्षों में यह समझौता एक नज़ीर बन सकता है कि कैसे असंभव दिखने वाले युद्धों को भी अंत में समाप्त किया जा सकता है – संवाद और समर्पण की भावना से।

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